चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास विभाग

उत्तर प्रदेश, भारत

माह - सितम्बर

  • गन्ने की बढ़ी फसल को गिरने से बचाने के लिये माह के प्रथम सप्ताह में गन्ने की दो पंक्तियों को आमने-सामने पिछले माह में बांधे गये झुंडों को आपस में मिलाकर बांधना चाहिये।
  • जिन खेतों में हरी खाद हेतु सनई, ढॉंचा बोकर पलट दिया गया था, उसकी जुताई करके खेत तैयार करना चाहिए।
  • यदि गन्ने की बुवाई नाली विधि द्वारा करनी है तो नालियों शीघ्र ही बना लें। समतल विधि द्वारा बुवाई के समय से दो पंख वाले हल से कूंड खोलकर बुवाई की जाये। दोनों विधियों में गन्ने की पंक्ति पूर्व से पश्चिम ही रखे व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेमी0 रखे।
  • गन्ने की शरदकालीन बुवाई का उपयुक्त समय वर्षा समाप्त होने व जाड़ा शुरू हाने के मध्य सितम्बर से अक्टूबर तक ही सीमित रहता है। अत: इस बुवाई का लाभ उठाने की दृष्टि से समय से बुवाई करें।
  • बुवाई हेतु बीज का गन्ना क्षेत्र की प्रमाणित पौधशालाओं से ही लें। बुवाई हेतु देर से पकने वाली जातियों को ही चुनना चाहिये, जो कि पिछले वर्ष के शरदकालीन फसल की ही हो।
  • बुवाई के समय तीन ऑंख के टुकड़े ही काटना चाहिये। प्रति हेक्टेयर बुवाई हेतु गन्ने की मोटाई के अनुसार 50 से 60 कुन्टल बीज अथवा 37,000 से 40,000 तक तीन आंख वाले टुकड़े की आवश्यकता होती है।
  • गन्ने में अच्छा जमाव ही अच्छी उपज का सूचक है, अत: बुवाई से पूर्व तीन आंख के पेड़ों की किसी स्वीकृत पारायुक्त दवा, जैसे- एरीकान 2 : या 6 : या एगलाल 3 : अथवा टफासान 3 : या 6 : अथवा गन्ना फसल बीज घोल 3 : या 6 : में से किसी एक घोल में डुबोकर बोना चाहिए। 3 : ताकत वाली दवा की 560 ग्राम मात्रा या 6 :शक्ति की दवा को 280 ग्राम मात्रा को 112 लीटर पानी में घोल तैयार करके उसके बीज उपचार चाहिये।
  • उन कृषकों के लिये जो रबी की फसलों की कटाई कर देरी से गन्ना बोते हैं, उनको चाहिए कि शरदकालीन बुवाई के साथ मिश्रित खेती करना आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद सिद्ध हुआ है, इसलिये रबी की फसलें जिन क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है, लेना चाहिए। मिश्रित खेती में प्राय: बौनी जातियों के गेहूं, मटर, धनिया, आलू आदि सरलतापूर्वक ले सकते हैं।
  • गन्ने की बुवाई के समय पर्याप्त नमी की दशा में 25 से 50 किलोग्राम नत्रजन हेक्टेयर देना चाहिये। मिट्टी की जॉंच के बाद सुझाव अनुसार फास्टफट या पोटाश देना उपयुक्त रहता है।
  • गन्ने की बड़ी फसल (पौधा व पेड़ो) में वर्षा के बाद वाली आवश्यकतानुसार सिंचाई करना चाहियें।
  • इस माह में काना, विवर्ण, लालपरी, गूदे की सड़न बामारियॉं दिखायी देती है। अत: फसल का निरीक्षण मुस्तैदी से करना चाहिये तथा नियंत्रण विधि अपनाना चाहिये।
  • पायरिला, चोटी बेधक, काला चिकटा, गुरदासपुर बेधक, सफेद मक्खी जैसे हानिकारक कीट भी दिखायी देते ही रोक-थाम के उपाय तत्परता से अपनाना चाहिये। प्रत्येक गन्ना कृषक को चाहिये कि गन्ने की प्रति हे0 उपज बढ़ाने पर भरपूर ध्यान रखें। अत: ’क्षेत्रफल कम उत्पादकता अधिक’ का सिद्धान्त अपनाकर गन्ने की कृषि करना श्रेयस्कर होगा।
  • बसन्तकालीन व देर बसन्तकालीन गन्ने में यदि यूरिया की टाइपड्रेसिंग शेष रह गयी हो तो सिंचाई उपरान्त ५० किग्रा० नत्रजन/हे० (११० किगा्र० यूरिया) की टाइपड्रेसिंग करें। ध्यान रखें की उर्वरक की पूर्ण मात्रा जून तक अवश्य डाल दें। इससे उर्वरक का पौधे भरपूर प्रयोग करते हैं व किल्ले कम मरते हैं। वर्षा काल में यूरिया का प्रयोग करने से उसका अधिकांश भाग नष्ट हो जाती है और अपेक्षित लाभ नही मिलता है।